WELCOME TO DHANUSHADHAM (According to Bishnu Puran)
In Satya Yuga, Lord Shiva Killed the Demon Tripurasura With a bow made From the Hard Wood of Maharishi Dadhichi. After Shivaji Killed the Demon Tripurasura, he enstrusted the bow to Prashuram Give it to King Janak of Mithila. After that, when these was a twelve Year Famine in the Mithila
Kingdom, the sky Said that if King Janak Plowed the Earth, rain Would Come, While Plowing in a Place Called Punaura in Sita, When The Plow Was Plowed, Sita Was Born Due to the Plough. Sita Went to Serve and raised that bow of Shiva With her hand Wrapped it with her Right Hand Rajkumar (Prince) Shri Ram Chandra While raising the bow Split into three Pieces and one piece of the right part went into the sky Which is known as Dhanush Koti in Tamil Naidu and the left Part fell into the Dhanushsagar Pond in Janakpur Which is Known as Dhanush sagar Pond. And the Middle Part of the Three Pieces is 20 KM. East of Janakpurdham. The Place is famous as Dhanushadham because it Fell Down. In the Middle of That bow there is huge Pipal Tree (Ficus religiosa) Which is estimated to be 550 Years old. Every 5 and 7 Year of Shivdhanush, A Same nut Grows and Three is a Small Pond Called Patal Ganga in That Place.
Read moreनुषा मंदिर धनुषा धाम नेपाल धनुषा नेपाल का प्रमुख जिला है । धनुषा नाम ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल ये भारतीय संस्कृति के उस संधिकाल का प्रतीक है जब विष्णु के एक अवतार परशुराम और उनके बाद के अवतार श्री राम का परस्पर मिलन हुआ था । धनुषा धाम में आज भी पिनाक धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में मौजूद हैं ।
धनुषा का इतिहास
वाल्मीकि रामायण में पिनाक धनुष भंग का विवरण काफी विस्तार से दिया गया है । त्रेतायुगीन जनक सीरध्वज मुनि विश्वामित्र और श्री राम को पिनाक धनुष का इतिहास बताते हुए कहते हैं कि मेरे पूर्वज देवरात को भोलेनाथ ने यह संभाल कर रखने के लिये दिया था । इसकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए मिथिला नरेश कहते हैं कि इस धनुष का प्रयोग मेरे वंश में कोई नहीं कर सका क्योंकि इसे उठाना और प्रत्यंचा चढ़ा पाना किसी के वश की बात नहीं । इसका आकार काफी विशाल है । इसे आठ पहियों वाले संदूक में रखकर मेरे पूजा घर में रखा गया है । हमारे परिवार की पुत्रियां धनुष वाले संदूक के चारों तरफ सफाई करती रहीं हैं ।
सीता उठा लेती थीं पिनाक धनुष
मिथिला नरेश कहते हैं कि बड़े आश्चर्य की बात है कि जबसे मेरी भूमिजा पुत्री सीता कुछ बड़ी हुई है तब से त वह बड़ी सहजता से ना केवल संदूक को इधर उधर आसानी से कर देती है बल्कि पिनाक धनुष को भी यहां से उठा कर वहां रख देना और चारों तरफ की सफाई करने में इसे कोई परेशानी नहीं होती ।
सीता का विवाह पिनाक धनुष तोड़ने वाले से क्यों
जानकी का यही गुण देख कर मिथिला नरेश ने इसका विवाह उस व्यक्ति से करने का निश्चय किया जो पिनाक धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने में समर्थ हो । इसकी घोषणा कर दी गई लेकिन बड़े दुख की बात रही कि अनेक पुरुष आये लेकिन कोई भी समर्थ साबित नहीं हुआ ।
वाल्मीकि रामायण में जनक के यज्ञ स्थल यानि वर्तमान जनकपुर के जानकी मंदिर के निकट अवस्थित मैदान रंगभूमि में इस धनुष को लाने के लिये सैकड़ों आदमियों को परिश्रम करना पड़ा । सैकड़ो आदमी आठ पहिये वाले संदूक को रस्सी से खींच कर यहां लाने में समर्थ हुए ।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब पिनाक धनुष टूटा तो भयंकर विस्फोट हुआ था। धनुष के टुकड़े चारों ओर फैल गए थे। उनमें से कुछ टुकडे़ यहां भी गिरे थे। मंदिर में अब भी धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में माने जाते हैं। त्रेता युग में धनुष के टुकड़े गिरे तो विशाल भू भाग में लेकिन इसके अवशेष को सुरक्षित रखा अब तक केवल धनुषा धाम के निवासियों ने । भगवान शंकर के पिनाक धनुष के अवशेष की पूजा त्रेता युग से अब तक अनवरत यहां चलती रही जबकि अन्य स्थान पर पड़े अवशेष लुप्त हो गये ।
धन्य हैं धनुषा के लोग जिन्होंने आज तक न केवल स्मृति अपितु ठोस साक्ष्य भी संभाल कर रखा हुआ है । हम शिवभक्त समाज को सादर नमन करते हैं ।
आप भी दर्शन कीजिये ।
पिनाक धनुष का रहस्य
लोक मान्यता के अनुसार दधीचि की हड्डियों से वज्र, सारंग तथा पिनाक नामक तीन धनुष रूपी अमोघ अस्त्र निर्मित हुए थे। वज्र इंद्र को मिला था । सारंग विष्णुजी को मिला था जबकि पिनाक शिवजी का था जो धरोहर के रूप में जनक जी के पूर्वज देवरात के पास रखा हुआ था।
इसी पिनाक धनुष को श्रीराम ने तोड़ कर विघटित कर दिया जबकि इसके विघटन की सूचना पाकर सारंग धनुष का प्रयोग करने वाले परशुराम सत्य की पुष्टि के लिये तुरंत मिथिला की ओर रवाना हो गये ।
दोहरि घाट में हुआ विष्णु के दो अवतारों का मिलन
दोहरि घाट ( क्रम संख्या 1- 40 ) में राम और परशुराम का मिलन हुआ । विष्णु के नवोदित अवतार श्री राम ने अपना सारंग धनुष परशुराम से वापस ले लिया ।
ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/67/17, 19, 20 मानस...
Read moreThere is historical evidence behind this place. As per history, middle part of Dhanush which was broken, fallen at this place. This place is approx 30-40min from Janakpur Temple and if someone is visiting Janakpur Temple, they must visit this place. As per Pandit Ji who do worship here, he brief everyone the basic information about this place. Dhanushadham, Janakpur Situated 18 km north-east of Janakpurdham, Dhanushadham, is believed to be the place where the broken remains of the divine Shiva bow fell after Ram broke it to obtain Sita’s hand in marriage. Dhandushadham is about an hour’s drive from Janakpur by bus. A fossilized fragment of the broken piece is still believed to be present here. Every Sunday in the month of Magh (January/ February), a Makar Mela (fair) takes place -a tradition that has not been broken since Vedic times - and tens of thousands of devotees from Nepal and India flock here to pay homage...
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